जन्म से विदाई तक एक लड़की की अनकही कहानी।
लेखिका: नूजहत जहां
एक लड़की की ज़िंदगी सच में आसान नहीं होती। वह जन्म लेती है किसी घर में, पलती-बढ़ती है वहीं… मगर बचपन से ही उसे सिखा दिया जाता है ये घर तुम्हारा नहीं है। वो हँसती है, खेलती है, अपने सपनों को सजाती है… माँ के आँचल में सुकून ढूँढती है, पिता की उंगली पकड़कर दुनिया को समझती है… फिर भी उसके मन के किसी कोने में ये बात बैठा दी जाती है कि एक दिन उसे यहाँ से जाना होगा। और फिर एक दिन… वो अपने ही घर से विदा हो जाती है। नए घर ससुराल में कदम रखती है, जहाँ अपनापन पाने में वक्त लगता है। वहाँ भी कभी शब्दों में, कभी नज़रों में उसे फिर वही एहसास मिलता है ये तुम्हारा घर नहीं है… तो सवाल उठता है… आख़िर उसका घर है कहाँ जब ज़िम्मेदारियों की बात आती है, तो कहा जाता है ये तुम्हारा घर है, इसे तुम नहीं संभालोगी तो कौन संभालेगा? लेकिन जब अधिकार की बात होती है, तो वही घर अचानक पराया हो जाता है। एक लड़की हर रिश्ता दिल से निभाती है हर दर्द सहकर भी मुस्कुराती है, हर ताने को चुपचाप सहकर भी अपनों के लिए खड़ी रहती है। लेकिन क्या किसी ने ये सोचा है वो भी इंसान है… उसका भी दिल है… उसे भी एक ऐसी जगह चाहिए, जहाँ उसे ये न सुनना पड़े कि तुम्हारा यहाँ कुछ नहीं। दुनिया सच में अजीब है… जहाँ एक लड़की से सब कुछ माँगा जाता है, मगर उसे अपना कहने में लोग हिचकिचाते हैं। शायद बदलाव की शुरुआत यहीं से होनी चाहिए जहाँ हम उसे पराया नहीं, बल्कि हर घर का सबसे अपना हिस्सा मानें। और इस बदलाव की सबसे खूबसूरत शुरुआत एक पति से हो सकती है। पति का फर्ज सिर्फ घर चलाना नहीं होता, बल्कि अपनी पत्नी का साथ निभाना होता है हर हाल में। उसकी इज़्ज़त करना, उसकी भावनाओं को समझना, उसके सपनों को अपना समझकर उन्हें पूरा करने में उसका साथ देना… यही एक सच्चे जीवनसाथी की पहचान है। जब दुनिया उसे पराया कहे, तो पति उसका सबसे अपना बनकर खड़ा रहे… जब वो थक जाए, तो उसका सहारा बने… जब वो चुप हो जाए, तो उसकी खामोशी को भी समझे… क्योंकि एक अच्छा पति वही होता है, जो अपनी पत्नी को घर की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि घर की सबसे बड़ी इज़्ज़त समझे।

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