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मदरसों की ज़रूरत और ज़कात की ज़िम्मेदारी

 




संवाददाता/जामताड़ा


ऑल इंडिया पसमांदा उलमा बोर्ड के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी सद्दाम हुसैन ने बताया है कि ज़कात दीन-ए-इस्लाम का एक बुनियादी रुक्न है और साहिबे-निसाब पर फ़र्ज़ है।इसकी अदायगी महज़ एक समाजी मदद नहीं, बल्कि शरीअत का मुक़र्रर किया हुआ हुक्म है।क़ुरआन-ए-करीम में इसके मसारिफ़ साफ़ तौर पर बयान कर दिए गए हैं और अहादीस में इसके जमा करने और तक़सीम करने का तरीक़ा मौजूद है।लिहाज़ा ज़कात को उन्हीं जगहों पर खर्च किया जा सकता है जिनका तअय्युन शरीअत ने किया है। मौजूदा दौर तख़स्सुस का दौर है। मेडिकल का माहिर इंजीनियरिंग में राय नहीं देता और इंजीनियर मेडिकल में दख़ल नहीं देता। हर फ़न के लिए अलग इदारे और अलग माहिरीन हैं। इसी तरह दीन और शरीअत का भी अपना मुकम्मल निज़ाम है, जिसमें वही लोग रहनुमाई के अहल हैं जिन्होंने उलूम-ए-दीन की बाक़ायदा तालीम हासिल की हो। अफ़सोस की बात है कि आज सोशल मीडिया और आम मजलिसों में ऐसे लोग भी ज़कात और दीन के मसाइल पर राय देने लगते हैं जिनका दीन से कोई तख़स्सुस नहीं रहा। जब दुनियावी मसाइल में ग़ैर-माहिर की बात क़बूल नहीं की जाती, तो दीन के नाज़ुक मसाइल में कैसे क़बूल की जा सकती है। दूसरी जानिब दीन की तालीम और हिफ़ाज़त के लिए मदरसे क़ायम हैं। यहाँ बुनियादी दर्जात से लेकर आला तख़स्सुस तक उलूम-ए-क़ुरआन, हदीस, फ़िक़्ह और दूसरे दीनि उलूम पढ़ाए जाते हैं। अगरचे तादाद के लिहाज़ से मदरसों में पढ़ने वाले तलबा की संख्या कम है, मगर यही इदारे पूरी मिल्लत की दीनि ज़रूरतों को पूरा कर रहे हैं। क़ुरआन में जिन अस्नाफ़-ए-ज़कात का ज़िक्र है फ़ुक़रा, मसाकीन, फी-सबीलिल्लाह और इब्नुस्सबील मदरसों के अक्सर तलबा इन अस्नाफ़ में शामिल होते हैं। हमारे मुल्क में, जहाँ दीनि तालीम के लिए न कोई मुकम्मल सरकारी इंतज़ाम है और न कोई पुख़्ता फंड, वहाँ मदरसों की मज़बूती इंतिहाई ज़रूरी है। रमज़ान के मुबारक महीने में जब ज़कात अदा की जाती है, तो अहले-ख़ैर हज़रात की ज़िम्मेदारी है कि वे अपनी ज़कात सही और शरीअत के मुताबिक़ मसारिफ़ में खर्च करें। दीन के मामले में मुस्तनद उलमा और भरोसेमंद इदारों से रहनुमाई लेना ही दुरुस्त तरीका है। अगर हमने मदरसों और दीनि इदारों से ग़फ़लत बरती तो आने वाली नस्लें दीन की बुनियादी तालीम से महरूम हो सकती हैं। हमारे अकाबिर ने मसाजिद और मदरसों के ज़रिए इस मुल्क में दीन की शमअ रौशन रखी। आज हमारी ज़िम्मेदारी है कि उस अमानत की हिफ़ाज़त करें। अल्लाह तआला हमें सही समझ और सही अमल की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।

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