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आज का समाज जितनी तेजी से डिजिटल हो रहा है, उतनी ही तेजी से मानवीय संबंधों की गरिमा और गहराई

जुनून बना जाल... प्रेम बना सवाल




में गिरावट आ रही है। प्रेम विवाह, जो कभी सामाजिक बदलाव और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की पहचान माने जाते थे, अब कई बार हत्या, धोखा और मानसिक शोषण की वजह बनते जा रहे हैं। जब दो व्यक्ति प्रेम करते हैं, तो वह एक उम्मीद और विश्वास के साथ जीवन का साथ चुनते हैं। लेकिन जब यह साथ सामाजिक स्वीकृति या पारिवारिक दबाव के कारण टूटता है, तो उसका अंत सिर्फ बिछड़ने पर नहीं होता बल्कि कई बार हत्या, आत्महत्या या ऑनर किलिंग जैसी दुखद घटनाओं में तब्दील हो जाता है। आज की युवा पीढ़ी रिश्तों को भावनाओं से नहीं, बल्कि स्वार्थ, जल्दबाजी और दिखावे की दृष्टि से देख रही है। सोशल मीडिया पर 'कपल गोल्स' दिखाने वाले वही जोड़े जब जमीनी सच्चाई से टकराते हैं, तो

वे उस प्रेम को निभा नहीं पाते। बढ़ते अपराधों के आंकड़े बताते हैं कि प्यार में असफल होने या संबंध टूटने के बाद सबसे ज्यादा हिंसा देखने को मिल रही है। कहीं लड़की ने मना किया, तो लड़का जान से मार बैठा। कहीं शादी के बाद दूसरे रिश्ते में पड़कर अपने ही जीवनसाथी को रास्ते से हटा दिया। इन घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है क्या आज के प्रेम में धैर्य और त्याग जैसी भावनाएँ बची भी हैं? समाज को, परिवार को और सबसे पहले शिक्षा व्यवस्था को यह समझना होगा कि प्रेम केवल आकर्षण नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है। हमें अपने युवाओं को यह सिखाना होगा कि इनकार का अर्थ अपमान नहीं होता, और हर टूटे रिश्ते का अंत हत्या नहीं हो सकता। जो प्यार कभी दुनिया से लड़ने की ताकत देता था, आज वही प्रेम दुनिया को खून से लाल कर रहा है। यह चिंतन का विषय है कि क्या हम प्रेम के अर्थ को खो बैठे है? आज जरूरत है रिश्तों को सहेजने की, समझने की न कि उन्हें अधूरा पाकर तबाह कर देने की। क्योंकि जब प्रेम अधूरा रह जाता है, तो सिर्फ एक रिश्ता नहीं, एक जीवन, एक भविष्य भी खत्म हो जाता है।

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