जामताड़ा: देश की सियासत में पसमांदा मुसलमानों का मुद्दा लगातार जोर पकड़ रहा है। इसी क्रम में ऑल इंडिया पसमांदा उलेमा बोर्ड के राष्ट्रीय प्रवक्ता मौलाना अब्दुल रकीब अंसारी ने बड़ा बयान देते हुए कहा है कि पसमांदा मुसलमानों की अनदेखी अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
उन्होंने कहा कि आबादी के अनुपात में राजनीतिक भागीदारी और सम्मानजनक प्रतिनिधित्व पसमांदा समाज का संवैधानिक अधिकार है। मौलाना अंसारी के अनुसार पसमांदा समाज, जिसमें अंसारी, मंसूरी, कुरैशी, मेमन, मोमिन, रायन, नट सहित कई बिरादरियां शामिल हैं, मुस्लिम आबादी का लगभग 80 से 85 प्रतिशत हिस्सा है, लेकिन सत्ता, संगठन और नीति-निर्माण में उनकी भागीदारी बेहद कम है।
“सिर्फ भाषण नहीं, ज़मीनी हक़ चाहिए”
मौलाना अंसारी ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में कई राजनीतिक दलों ने पसमांदा समाज की बात की है। उन्होंने उल्लेख किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सार्वजनिक मंचों से पसमांदा मुसलमानों का जिक्र किए जाने के बाद यह मुद्दा राष्ट्रीय बहस का विषय बना। वहीं अखिलेश यादव की अगुवाई वाली समाजवादी पार्टी समेत अन्य क्षेत्रीय दलों ने भी प्रतिनिधित्व देने की घोषणाएं कीं।
हालांकि उन्होंने सवाल उठाया कि घोषणाओं से आगे बढ़कर कितनी पार्टियों ने टिकट वितरण और संगठनात्मक ढांचे में पसमांदा समाज को वास्तविक हिस्सेदारी दी है?
2027 चुनाव होंगे अग्निपरीक्षा
राष्ट्रीय प्रवक्ता ने स्पष्ट कहा कि आगामी 2027 विधानसभा चुनाव, विशेषकर उत्तर प्रदेश में, पसमांदा प्रतिनिधित्व की असली परीक्षा होंगे। अगर राजनीतिक दल आबादी के अनुपात में उम्मीदवार नहीं देंगे तो पसमांदा समाज अपनी रणनीति खुद तय करेगा।
सामाजिक न्याय और बराबरी की मांग
मौलाना अंसारी के अनुसार पसमांदा आंदोलन केवल राजनीतिक पद पाने की लड़ाई नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, शिक्षा, रोजगार और सम्मान की जंग है। उन्होंने मांग की कि—
शिक्षा और स्किल डेवलपमेंट पर विशेष योजनाएं बनाई जाएं
सरकारी योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे
मुस्लिम समाज के भीतर सामाजिक बराबरी को बढ़ावा दिया जाए
धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं में समावेशी नेतृत्व सुनिश्चित हो
“वोट बैंक नहीं, पावर शेयरिंग चाहिए”
मौलाना अंसारी ने कहा कि पसमांदा मुसलमान अब केवल वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा नहीं बनेंगे। “हमें प्रतीकात्मक नहीं, वास्तविक भागीदारी चाहिए। पसमांदा समाज अब जाग चुका है और अपने अधिकारों के लिए संगठित संघर्ष करेगा।”
उन्होंने कहा कि पसमांदा मुसलमानों का आंदोलन आज भारतीय राजनीति के केंद्र में है और आने वाले चुनावों में प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी का मुद्दा निर्णायक साबित हो सकता है।
अब देखना यह है कि राजनीतिक दल इस संदेश को कितनी गंभीरता से लेते हैं, क्योंकि पसमांदा समाज ने साफ संकेत दे दिया है कि अधिकारों की यह लड़ाई निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है।
(वेब डेस्क | जामताड़ा)

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